विशेष रिपोर्ट : राजस्थान में दूसरे चरण का मतदान जातीय समीकरण में उलझा, मतदाताओं की नजर में ‘मोदी फैक्टर’ वेंटिलेटर पर अबकी बार, बीजेपी की सांसे फूली

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 22 अप्रैल 2024 | जयपुर – दिल्ली – जोधपुर : राजस्थान में 26 अप्रैल (शुक्रवार) को 13 सीटों पर दूसरे चरण के मतदान होने हैं। बाड़मेर-जैसलमेर, जालोर-सिरोही, जोधपुर, कोटा, बांसवाड़ा हॉट सीट बनी हुई हैं। हवा का रुख जानने के लिए मूकनायक मीडिया टीम इन 13 सीटों पर पहुंची।

विशेष रिपोर्ट :

पहले चरण के मतदान के बाद राजस्थान में बीजेपी की सांसे फूली हुई है क्योंकि कोई मोदी लहर नहीं है जिससे बीजेपी के उम्मीदवार डरने लगे हैं। कहीं पर भी राम मंदिर का मुद्दा नहीं दिखलाई पड़ता है। पर जातीय समीकरण कैंडिडेट की जीत का सबसे बड़ा कारण बन रही हैं। टोंक सवाई माधोपुर, जोधपुर, बाड़मेर-जैसलमेर, पाली, जालोर-सिरोही, अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ का सियासी गणित जातियों में उलझ गया लगता है।

राजस्थान में दूसरे चरण का मतदान जातीय समीकरण में उलझा

टोंक-सवाई माधोपुर संसदीय सीट का राजनीतिक समीकरण बहुत ही दिलचस्प

MOOKNAYAKMEDIA Copy 35 Copy Copy 300x195 विशेष रिपोर्ट : राजस्थान में दूसरे चरण का मतदान जातीय समीकरण में उलझा, मतदाताओं की नजर में मोदी फैक्टर वेंटिलेटर पर अबकी बार, बीजेपी की सांसे फूलीटोंक-सवाई माधोपुर लोकसभा क्षेत्र का अपने आप में बेहद अनूठा इतिहास रहा है। सभी वर्गों के उम्मीदवार यहां से सांसद बने हैं। टोंक जिले को साल 2008 के परिसीमन के बाद सवाई माधोपुर संसदीय क्षेत्र में शामिल किया गया है। टोंक-सवाई माधोपुर संसदीय सीट का राजनीतिक समीकरण बहुत ही दिलचस्प है।

भाजपा के निवर्तमान सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया पर भाजपा ने विश्वास जताते हुए फिर से लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी बनाया है। इसीलिए बीजेपी बैकफूट पर है। वहीं, कांग्रेस ने हरीश मीणा जो कि वर्तमान में टोंक जिले के ही देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। उन्हें इस लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उतारा गया है।

टोंक-सवाई माधोपुर लोकसभा क्षेत्र गुर्जर, मीणा तथा मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है। ऐसे में परिसीमन होने के बाद भी भाजपा तथा कांग्रेस दोनों ही बड़ी पार्टियों ने इन्हीं जातियों में से अपना प्रत्याशी बनाया है। इस बार भी दोनों ही पार्टियों ने जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भाजपा से गुर्जर समाज से आने वाले सुखबीर सिंह जौनपुरिया तथा कांग्रेस पार्टी ने मीणा समुदाय से आने वाले हरीश मीणा पर अपना दांव खेला है।

लोकसभा सीट की आठ विधानसभा सीटों में से वर्तमान में चार पर भाजपा और चार पर कांग्रेस का कब्जा है। सवाई माधोपुर, बामनवास, गंगापुरसिटी, देवली उनियारा में हरीश मीणा और मालपुरा, निवाई में जौनपुरिया मजबूत दिखा रहे हैं वहीं टोंक और खंडार में दोनों में कांटे की टक्कर हो सकती है। बूथ मैनेजमेंट दोनों के लिए ही बहुत महत्त्वपूर्ण पहलू रहेगा।

बाड़मेर-जैसलमेर: त्रिकोणीय मुकाबला, जातिगत समीकरण सबसे अहम

पिछले दस साल से यह सीट भाजपा के पास है। यही कारण है कि भाजपा ने मंत्री रहे कैलाश चौधरी पर विश्वास जताया है। वहीं गठबंधन के बाद रालोपा से कांग्रेस में आए उम्मेदाराम बेनीवाल चुनाव लड़ रहे हैं। दोनों को टक्कर दे रहे हैं निर्दलीय प्रत्याशी रविंद्र सिंह भाटी। 6 महीने पहले ही भाटी शिव विधानसभा से जीत कर विधायक बने हैं। पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी कांग्रेस और भाजपा को टक्कर दे रहा है। यहां 62 साल से कोई निर्दलीय प्रत्याशी नहीं जीता है। इससे पहले 1957 में निर्दलीय रघुनाथ सिंह जीते थे।

यहां जातिवाद का मुद्दा सबसे हावी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने जाट प्रत्याशी को टिकट दिया तो राजपूत समाज से भाटी निर्दलीय चुनाव लड़ने उतर गए। भाजपा के कैलाश चौधरी मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे को लेकर जाट समाज में उनका विरोध है।

इधर, उम्मेदाराम बेनीवाल को रालोपा के साथ कांग्रेस के वोट बैंक का फायदा मिलेगा। त्रिकोणीय मुकाबले में उम्मेदाराम बेनीवाल और रविंद्र सिंह भाटी के बीच दूसरी जाति के वोट लेने के लिए कड़ी टक्कर रहेगी। भाजपा और कांग्रेस में जाट वोटों का बंटवारा होने से चुनाव में मूल ओबीसी, अल्पसंख्यक, एससी-एसटी वोटर हार जीत तय करेंगे।

जोधपुर : जाट-विश्नोई वोटर हार-जीत का फैसला करेंगे

जोधपुर लोकसभा सीट पर इस बार भाजपा से जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और कांग्रेस के करण सिंह उचियारड़ा में सीधी टक्कर है। जोधपुर शहर की विधानसभा में गजेंद्र सिंह शेखावत का मजबूत आधार है। वहीं करण सिंह उचियारड़ा ग्रामीण क्षेत्र की विधानसभाओं में मजबूत हैं।

दोनों प्रत्याशियों की बयानबाजी से चुनाव का माहौल गर्मा दिया है। उचियारड़ा ने शेखावत को मीठी मासी कहा, संजीवनी घोटाले की लैंड क्रूजर में घूमने, पैराशूट प्रत्याशी, 10 साल जीरो काम जैसे आरोप लगाए। वहीं शेखावत ने उचियारड़ा पर शहजाद के घर जाना पड़ेगा, चांद तक सोने की सीढ़ी लगाने के लिए सोना राहुल गांधी के आलू की मशीन से लाने जैसे तंज किए।

जालोर-सिरोही : कांग्रेस- भाजपा में सीधी टक्कर, जातिगत वोट बैंक अहम

लुंबाराम चौधरी मोदी के नाम पर खुद को आम कार्यकर्ता और वैभव को बाहरी बताकर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं वैभव पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की योजनाओं के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं। यहां चौधरी, माली और देवासी वोटर सबसे ज्यादा हैं। वैसे तो यह वोट बैंक बीजेपी का है, लेकिन अशोक गहलोत सामाजिक समझौते कर इन्हें साधने में लगे हैं। वैभव की पत्नी ने माली वोट साधने के लिए कहा कि इस बार नहीं जिताया तो अगली बार समाज को कोई टिकट नहीं देगा।

पाली : दोनों प्रत्याशी बाहर के, मोदी की लहर

पाली लोकसभा सीट भाजपा का गढ़ बनी हुई है। यहां विधानसभा चुनाव में 8 में 6 सीटों पर भाजपा और 2 सीटों पर कांग्रेस जीती थी। पानी, सड़क, प्रदूषण सबसे अहम मुद्दे हैं, लेकिन इन पर मोदी की लहर हावी है। बीजेपी ने 10 साल से सांसद रहे पीपी चौधरी को रिपीट किया है। वहीं कांग्रेस ने इस बार नए चेहरे राजस्थान बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष रही संगीता बेनीवाल को मैदान में उतारा है। चौधरी सोजत, पाली, मारवाड़ जक्शन, बाली, सुमेरपुर में मजबूत दिख रहे हैं। वहीं संगीता बेनीवाल महज ओसियां, भोपालगढ़ और बिलाड़ा में प्रभावशाली दिख रही हैं।

अजमेर : हर मुद्दे से बड़ा धर्म

यहां जाट बनाम जाट का मुकाबला है। भाजपा ने सांसद भागीरथ चौधरी को फिर मौका दिया है। लम्बे समय से डेयरी चेयरमैन रहे रामचंद्र चौधरी कांग्रेस से प्रत्याशी हैं। यहां धर्म हर मुद्दे से बड़ा है। ऐसे में कांग्रेस को मुस्लिम क्षेत्रों में अच्छी खासी बढ़त मिलती है। भाजपा राम मंदिर, धारा 370 हटाने, केंद्र सरकार के पाकिस्तान के खिलाफ रवैये जैसे मुद्दे के कारण इस सीट को सुरक्षित मान रही है। जाटों के अलावा रावत, गुर्जर, ब्राह्मण और मुस्लिम वोटर्स का प्रभाव सबसे ज्यादा है।

भीलवाड़ा : ब्राह्मण-वैश्य समीकरण की चर्चा

कांग्रेस ने पहले यहां से गुर्जर समाज के दामोदर गुर्जर को टिकट दिया था। बाद में बदलकर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी को प्रत्याशी बनाया। डॉ. जोशी के सामने भाजपा से दामोदर अग्रवाल हैं। ये लोकसभा क्षेत्र भी उनमें से है, जहां भाजपा का प्रत्याशी कोई भी हो, लेकिन चेहरा और मुद्दा मोदी ही बने हुए हैं।

चित्तौड़गढ़: भाजपा के जोशी को भितरघात का खतरा

इस सीट पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी के सामने कांग्रेस से गहलोत सरकार के पूर्व मंत्री उदयलाल आंजना खड़े हुए हैं। यहां विधानसभा चुनाव से ही चंद्रभान सिंह आक्या के साथ उनकी अदावत चल रही है। आक्या का टिकट कटने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में निर्दलीय के रूप में जीत मिली थी। इस तरह के समीकरणों से जोशी की राह आसान नहीं दिख रही।

मतदाताओं की नजर में ‘मोदी फैक्टर’ वेंटिलेटर पर अबकी बार

बीजेपी पिछले 10 साल से केंद्र में सत्ता में है। गुजरात मॉडल के तिलिस्म को दिखाकर 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने पूरी बीजेपी को केंद्र में जीत दिला दी और प्रधानमंत्री बन गये। अभी वो तिलिस्म टूटने लगा है। मोदी का मैजिक बरकरार नहीं रहा है क्योंकि ज्यादा दिनों तक झूठ चल भी नहीं सकता है।

अबकी बार लगातार दो चुनाव में जीत हासिल करने के बाद नई ऊर्जा से भरी बीजेपी के लिए अपने घर में जीतना आसान नहीं दिख रहा है। चुनावी बांड को ख़ारिज कर बरसे मोदी पर सुप्रीम कोर्ट के डंडे के बाद  तो माहौल पूरी तरह बदल गया।

इस माहौल में कांग्रेस बराबरी  पर आ कड़ी हुई है। भारत जोड़ो संदेश यात्राओं ने राहुल को मोदी-शाह के कद के सामने खड़ा कर दिया है। बीजेपी का बूथ लेवल मैनेजमेंट भी दरक रहा है। कांग्रेस में व्याप्त बीजेपी की स्लीपर सेल (ओल्ड ग्राड कांग्रेसी) को राहुल गाँधी द्वारा दरकिनार करने से कांग्रेस के पास बूथ लेवल तक के कार्यकर्ता खड़े होने लगे हैं।

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इसने कांग्रेस को मजबूत करने में मदद की। प्रियंका गाँधी का फैक्टर भी कांग्रेस के पक्ष में गया है। सबसे बड़ी मोदी की दिक्कत ये है कि इलेक्टोरल बांड से उनके दामन पर शायद कभी न मिटने वाला दाग लगा है। लेकिन विडंबना ये है कि इस दाग को धोने की कोशिश में वो देश की जनता को भ्रमित कर रहे हैं जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्व और एक मायने में देश के लिए हानिकारक और खतरनाक भी है। लोग इस बात को समझाने लगे हैं।

बीजेपी की सांसे फूली 

MOOKNAYAK Copy 2 300x187 विशेष रिपोर्ट : राजस्थान में दूसरे चरण का मतदान जातीय समीकरण में उलझा, मतदाताओं की नजर में मोदी फैक्टर वेंटिलेटर पर अबकी बार, बीजेपी की सांसे फूलीजैसा कि हमने पहले कहा है पहले चरण के मतदान के बाद राजस्थान में बीजेपी की सांसे फूली हुई है क्योंकि कोई मोदी लहर नहीं है जिससे बीजेपी के उम्मीदवार डरने लगे हैं। बीजेपी की टेंशन का दूसरा बड़ा कारण अल्पसंख्यकों द्वारा सबसे ज्यादा वोटिंग करना भी है। वहीं बीजेपी में दूसरी पार्टियों से आये नेताओं को उम्मीदवार बनाने से बीजेपी का कोर कैडर भी अच्चा खासा नाराज है और बूथों पर नजर नहीं आ रहा है।

जर्मनी का फासीवादी नेता अडॉल्फ हिटलर प्रोपेगंडा के जरिए ताकतवर छवि बनाने में बेहद माहिर था। मोदी भी ताकतवर छवि में यकीन करते हैं। शायद इसीलिए उन्होंने अमेरिका की उस कंपनी को भाड़े पर लगाया है जिसके क्लाइंट लिस्ट में कई तानाशाह शामिल रहे हैं, जैसे – नाइजिरिया के पूर्व तानाशाह सनी अबाचा, कजाकिस्तान के ताउम्र राष्ट्रपति नूरसुल्तान अबिशुली।

ये अमेरिकी कंपनी है ‘एपीसीओ वर्ल्डवाइड’ (APCO WORLDWIDE)। रूस के पूर्व वामपंथी युवा नेता जो अब रूस का अरबपति है और जिसके माफिया के साथ संबंध हैं उसने भी अपनी छवि बदलने के लिए एपीसीओ की सेवाएं ली थीं। दागी नेताओं की छवि को लोगों के बीच उठाना इस पीआर कंपनी की खासियत है।

पेपर पर तो इस कंपनी का काम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रांड गुजरात को बेचकर विदेशी निवेश आकर्षित करना है। वायब्रंट गुजरात समिट का पूरा जिम्मा इसी कंपनी के हाथों में है। लेकिन इस कंपनी का असल काम मोदी की छवि को बदलना है। मोदी ने एपीसीओ की सेवाएं साल 2007 में गुजरात चुनावों से पहले लेनी शुरू की थीं। (देखें 18 नवंबर, 2007 की टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट) दूसरी बार सत्ता में लौटने पर मोदी ने एपीसीओ के कॉन्ट्रेक्ट को बढ़ा दिया। 2009 में वायब्रंट गुजरात समिट का जिम्मा एपीसीओ को दिया गया। इस साल जनवरी 2013 में भी वायब्रंट गुजरात समिट का जिम्मा एपीसीओ को ही सुपुर्द था।

मोदी ने भ्रम की बुनियाद पर अपने ख्वाबों की इमारत खड़ी की है। लेकिन याद रखना चाहिए कि भ्रम का वजूद पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर होता है। उसका फूटना अवश्यम्भावी है। यही उसकी प्रकृति है।

 

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